मुंबई: वंचित बहुजन आघाड़ी (VBA) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट प्रकाश आंबेडकर ने देश में हाथ से मैला ढोने (मैनुअल स्केवेंजिंग) की अमानवीय प्रथा को लेकर केंद्र सरकार और सामाजिक व्यवस्था पर जोरदार हमला बोला है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (ट्विटर) पर जारी एक बयान में उन्होंने वैज्ञानिक प्रगति और सामाजिक यथार्थ के बीच के बड़े अंतर को उजागर किया।
प्रकाश आंबेडकर ने अपने ट्वीट में लिखा:
“हमारा देश चाँद तक पहुँच गया है लेकिन आज तक मैला ढोने की अमानवीय प्रथा को खत्म नहीं कर पाया है। क्यों? क्योंकि समाज ने सदियों से इसे इंसानियत के खिलाफ नहीं बल्कि जाति के खाँचे में डालकर और इसे ‘दलितों की समस्या’ मानकर हमेशा अनदेखा किया है।”
अपने इस बयान के जरिए आंबेडकर ने स्पष्ट किया कि भारत ने अंतरिक्ष और तकनीक के क्षेत्र में अभूतपूर्व सफलताएँ हासिल की हैं, लेकिन सामाजिक कुरीतियों को मिटाने में हम अब भी पीछे हैं। उन्होंने इस बात पर गहरा दुख और रोष जताया कि मैला ढोने जैसी घिनौनी और अमानवीय प्रथा को एक सामाजिक या मानवीय मुद्दा मानने के बजाय हमेशा जातिगत चश्मे से देखा गया।
उन्होंने तर्क दिया कि इस समस्या का स्थायी समाधान इसलिए नहीं हो सका, क्योंकि समाज और सत्ता ने इसे केवल ‘दलितों की समस्या’ मानकर अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लिया।
हालांकि भारत सरकार ने कानूनी रूप से हाथ से मैला ढोने की प्रथा पर प्रतिबंध लगाया है, लेकिन जमीनी स्तर पर आज भी सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई के दौरान मौतों की खबरें आती रहती हैं। प्रकाश आंबेडकर के इस ट्वीट ने एक बार फिर देश के सामाजिक चेतना, पुनर्वास नीतियों और आधुनिक भारत की प्राथमिकताओं पर गंभीर बहस छेड़ दी है।






